‘झूठा सच’ की समीक्षा

हिंदी साहित्य के जानेमाने उपन्यासकारों में यशपाल एक हैं। उनमें उनका उपन्यासझूठा सचजो कि भारत विभाजन पर लिखी गई अब तक की सर्वश्रेष्ठ कृति मानी जाती है। उन्होंने इस उपन्यास को दो भागों में लिखा है जिसका पहला भागझूठा सच( वतन और देश)’ एवं दूसरा भागझूठा सच (देश का भविष्य)’ है, यूं तो यशपाल किसी परिचय के मोहताज नहीं है ।इन्होंने भारत की आजादी में स्वतंत्रता सेनानी शहीद भगत सिंह के साथ मिलकर बम बनाने का भी कार्य किया था। इसी बीच उन्हें जेल भी हुई थी तथा इन्होंने जेल से ही अपने रचनात्मक कार्य को एक नया मोड़ दिया। यशपाल प्रगतिवादी लेखक हैं। इनका वाम दल के तरफ ज्यादा झुकाव था। इनका बाकी उपन्यासों में से हम देखेंगे तो उसमें मार्क्सवाद का सिद्धान्त नज़र आएगा,लेकिन इनका उपन्यासझूठा सचके दोनों भागों में कांग्रेस से मोहभंग की स्थिति सामने उभर कर आती है। उपन्यास के बारे में उन्होंने कहा था किझूठा सचके दोनों भागोंवतन और देशऔरदेश का भविष्यमें देश के सामाजिक और राजनीतिक वातावरण को यथावत ऐतिहासिक यथार्थ के रूप में चित्रित करने का बल किया गया है। उपन्यास के वातावरण को ऐतिहासिक यथार्थ का रूप देने और विश्वसनीय बना सकने के लिए कुछ ऐतिहासिक व्यक्तियों के नाम भी गए हैं परंतु उपन्यास में वह ऐतिहासिक व्यक्ति नहीं, उपन्यास के पात्र हैं ।कथा में कुछ ऐतिहासिक घटनाएं अथवा प्रसंग अवश्य है परंतु संपूर्ण कथा कल्पना के आधार पर उपन्यास है,इतिहास नहीं है। उपन्यास के सभी पात्र जैसे तारा, जयदेव पुरी,कनक,गिल,डॉक्टर नैयर,सुद जी,सोमराज,रावत,ईसाक,असद और प्रधानमंत्री भी काल्पनिक पात्र हैं।

प्रथम भाग में भारतपाकिस्तान विभाजन भारतीय राज्य के इतिहास का वह अध्याय हैं जो एक विराट त्रासदी के रूप में अनेक भारतीयों के मन पर आज भी अग्नि की तस अंकित है अपनी जमीनों घरों से विस्थापित स्तंभ लोग जब नक्शे में खींची गई एक रेखा के इधर और उधर की यात्रा पर निकल पड़े हैं। 

वहीं दूसरे भाग में दिखाया गया है कि विभाजन के बाद भारत की क्या राजनीतिक,सामाजिक आर्थिक दशा रही थी। उपन्यास का  केंद्र पाकिस्तान के लाहौर का भोला पांधे की गली का एक मध्यवर्गीय हिन्दू परिवार है, लेकिन आगे चलकर यह उपन्यास पूरे लाहौर,पंजाब और फिर पूरे भारत की तत्कालीन गतिविधियों के साथसाथ लेकर चलता है।

भोला पांधे के परिवार का बेटा जयदेव पुरी और उसकी बहन तारा और प्रेमिका कनक इस उपन्यास का मुख्य पात्र हैं, जिसकी कहिनियाँ विभाजन के सरजमियों और संप्रदायिक हिंसा और तनाव से भरे माहौल के साथ साथ चलती है ।इन तीन मुख्य और अनगिनत मुख्य पात्रों के माध्यम से यशपाल ने विभाजन के समय और परिस्थितियों का एक सजीव और प्रमाणिक चित्र प्रस्तुत किया है।

पूरी मध्यवर्ग का प्रतिनिधि पात्र है, जो अपनी सारी कमजोरियों के साथ उपन्यास में मौजूद है। विभाजन से पहले वह अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद पत्रकारिता के जरिए राजनेताओं द्वारा फैलाए जा रहे द्वेष को देश के आम जनता के सामने उजागर करता है। और अंततः अपने सिद्धांतों के कारण नौकरी से निकाल दिया जाता है। वह एक प्रगतिशील,समझदार और धार्मिक सद्भाव में विश्वास रखने वाला पात्र है। लेकिन नौकरी से निकाल दिए जाने और विभाजन के कारण परिस्थितियां बदलने के बाद उसे दोबारा अपने पैरों पर खड़ा होने के लिए काफी संघर्ष करना पड़ता है। विभाजन  के समय पुरी और उसके परिवार को लाहौर छोड़ना पड़ता है और पुरी काफी संघर्षों के बाद भारत में एक पत्रकार संपादक बन जाता है आगे चलकर प्रगति करते हुए फिर विधायक और कई सरकारी कमेटियों में मेंबर भी बनता है और इस तरह पूरी का रूपांतरण हो जाता है एक सिद्धांत वादी आम इंसान से अवसरवादी राजनेता में, जिसे अपनी बहन पर अत्याचार करने वाला आदमी भी बुरा नहीं लगता क्योंकि उसमें पूरी का काम निकलता है।

तारा मध्यवर्गीय लेकिन प्रगतिशील सोच रखने वाली एक आम लड़की है जिसने देश के बंटवारे को एक नागरिक के रूप में कम और एक स्त्री के रूप में ज्यादा झेला है। हिंसा और दंगों के बीच उसे सुहागरात से उठा लिया जाता है और उसके बाद जिन हालातों का सामना उसने किया,किसी राजनीतिक स्थितियों को उन हालातों के रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता और ना ही कोई भी   माफ़ी तारा के घाव भरने में पर्याप्त सिद्ध हो सकती है।फिर भी तारा उपन्यास में एक सशक्त पात्र के रूप में उभर कर आती है और अपने अतीत को पीछे छोड़ दिल्ली में अपने परिवार से बिछड़ कर यानी उन्हें त्याग कर अकेले ऊँचे पद सरकारी पद तक पहुंचती है और अपने जिंदगी के फैसले खुद लेती है

 कनक भी तारा की तरह एक प्रगतिशील और नई सोच रखने वाली लेकिन एक संपन्न परिवार की लड़की है, जहां उसे उसके फैसले लेने में इतनी समस्या नहीं होती, जितनी तारा को। कनक के परिवार को भी विभाजन के समय लाहौर में अपने घर को छोड़कर दिल्ली आकर बसना पड़ता है। कनक पुरी के साथ प्रेम करती है लेकिन वह पुरी के अवसरवादी और छल पूर्ण व्यवहार को अस्वीकार करने की हिम्मत भी रखती है। कनक और पुरी के संबंध में यशपाल ने अपनी स्त्री संबंधित सोच को व्यक्त किया है। जिसमें यशपाल स्त्रियों के सारे फैसले स्त्रियों को लेने देने के पक्ष में खड़े नजर आते हैं

इसी प्रकार से उपन्यास अपनी प्रगतिशीलता को कायम करते हुए आगे बढ़ती है। यहां तक कि उन्होंने यह भी दिखाने का प्रयास किया है कि गुलाम भारत में जिस प्रकार भारत अंग्रेजों के अधीन था उसी प्रकार से आजाद भारत में विभाजन के बाद भारत कांग्रेस पार्टी के अधीन है।जिसके प्रतिनिधि पात्र के रूप में उन्होंने सूद जी नामक पात्र को लाया है।

 सूद जी एक कांग्रेसी नेता हैं,जो पुरी को भारत आने पर काफी मदद करते हैं। उन्हें जालंधर के विधानसभा के सीट से चुनाव लड़ने का मौका भी मिलता है और वह हमेशा जीत भी जाते थे।कई बार  विधायक भी बन जाते हैं फिर आगे चल कर मंत्री भी बनते हैं,लेकिन लोकतंत्र में जब जनता में जागरुकता पैदा हो जाती है तो एक बार लोकतंत्र के महापर्व में वह अपने क्रूर रवैये के कारण अपने ही सीट से चुनाव हार जाते हैं।

 

अमित कुमार

सन्दर्भ:-पोषम पा

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